वेदमूर्ती देवव्रत
जब श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी ने वेदों के बारे मैं लिखा की
“वेद-वेद के मंत्र-मंत्र मैं,मंत्र-मंत्र की ऋचा-ऋचा मैं,ऋचा-ऋचा की पंक्ति-पंक्ति मैं,पंक्ति-पंक्ति के अक्षर,स्वर मैं दिव्य ज्ञान आलोक प्रदीपित,सत्यम,शिवम्,सुंदरम् शोभित,कपिल,कणाद और जैमिनी की स्वानुभूति का अमर प्रकाशन,विषद विवेचन,प्रत्यालोचन,ब्रह्म,जगत,माया का दर्शन,कौन दार्शनिक दे पाया है अब तक ऐसा जीवन दर्शन?”
यह पढ़ना अद्भुत था,वेदों की वीथिकाओं के प्रति अनुराग और सघन हो उठा,लगा विवेकानंद ने जो वेदों के बारे मैं कहा वो कम ही था,पर एक दिन जब “वेदमूर्ती देवव्रत महेश रेखे” के बारे मैं पढ़ा,देखा की कैसे माध्यंदिनी शाखा मैं यजुर्वेद के मंत्रों का दंडक्रम पारायण विधि से दो हज़ार मंत्रों का अतिविशिष्ट पाठ जिसमें पदों को सीधा,उल्टा,विशेष गति और क्रम से सस्वर पाठ किया जाता है और एक भी चूक होने पर पूर्ण पाठ नया शुरू करना पड़ता है,और इन आवृतियों की संख्या पचास लाख होती है और अब तक के ज्ञात इतिहास मैं केवल तीन ही लोग यह पारायण पूर्ण कर पाए हैं और पिछले दो सौ वर्षों मैं सिर्फ़ देवव्रत ने यह किया है वो भी सिर्फ़ उन्नीस वर्ष की आयु और सबसे कम समय मैं पूर्ण किया ,तब लगा की वेदों की ऋचाओं के बारे मैं जो कहा गया वो बहुत अल्प है ।
यह भारतीय मेधा का ऐसा अनुपम विस्फोट है,जो ११ सितंबर १८९३ के विश्व धर्म सम्मेलन मैं स्वामी विवेकानंद के संदेश को पुनर्प्रतिष्ठित करता है।यह भारत,यहाँ की ज्ञान परंपराओं एवं सीखने की उत्कट इच्छा के सिंहनाद के रूप मैं सामने आता है।देवव्रत की प्रतिभा,संयम,अनुशासन,समर्पण,निष्ठा,एकाग्रता,विनम्रता एवं ज्ञान पिपासा अद्वितीय है,असाधारण है,अविश्वसनीय सी है ।यह युवा विवेकानंद द्वारा इच्छित १०० युवाओं मैं से एक है।यह युवा अर्वाचीन और प्राचीन भारत का संगम बिंदु है।भारत और इसकी अक्षय ज्ञान परंपरा का साकार स्वरूप है,राष्ट्रीय और वैश्विक क्षितिज पर भारत के मान बिंदु स्वरूप उर्ध्वगामी होगा,ऐसी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है।
डॉ.चक्रवर्ती जानकी नारायण श्रीमाली,ब्रह्मपुरी चौक,बीकानेर ।


